Sunday, September 25, 2011

Shabnam Ramaswamy.......शबनम रामास्वामी


Shabnam Ramaswamy

founder :NGO- Street Survivor
social worker .working for the downtrodden and street children .

शबनम रामास्वामी
Street Survivor NGO की संस्थापक
सामाजिक कार्यकर्ता – निचले तबके और सड़क पर रहने वाले बच्चो के लिए कार्य

पश्चिम बंगाल के अंदरूनी हिस्से मुर्शिदाबाद के एक गांव कटना में जन्मी शबनम को उनके पिता की सेना में नौकरी करने की वजह से कोलकाता के अभिजात वर्ग के स्कूल La Martinere में अध्ययन करने का मौका मिला. उनकी शादी 16 साल से भी कम उम्र में ही एक धनी पर 32 साल के व्यक्ति से कर दी गयी .उसका पति उसे हमेशा मरता-पीटता रहता था उनके दो बच्चे थे पर उसका पति उसे बहुत बार रात को घर से बाहर फेंक देता था उसे लगता था कि उसके बच्चो की शक्ल उस से नहीं मिलती .इस से तंग आकार 24 साल की उम्र में ही एक रात को उसने अपने बेटे के साथ अपना घर छोड़ दिया.
दो महीने के लिए, वह सियालदह स्टेशन के यार्ड में खड़ी एक रेल की बोगी में रही , जिसके बाद उन्होंने एक नौकरी की तलाश की जिस से वो गरीबी और फटेहाल जिंदगी से बाहर आये और काम करे . उनकी किस्मत ने फिर उनका साथ दिया और एक दशक के भीतर, वह एक सफल इंटीरियर डेकोरेटर के रूप में स्थापित हो गयी उसके पश्चात उन्होंने तलाक के लिए आवेदन किया जो उन्हें मिल गया साथ ही उन्हें बच्चों को पालने का आधिकार भी मिल गया . अब वो इस जीवन से थक गयी थी उन्हें लगता था कि वो किसी और काम के लिए जन्मी हैं उन्हें जरूरतमंदों कि मदद करणी हैं इसलिए उन्होंने सामाजिक कार्य करना शुरू कर दिया . उन्हें बड़ा अजीब लगा कि एक व्यवसायी उन्होंने के बाद उसी शहर में अब वो सामाजिक कार्य शुरू कर रही हैं..इसलिए उन्होंने कलकत्ता छोड़ने का निर्णय ले लिया और ६ शहरो का चुनाव किया जहा वो अपना सामाजिक कार्य कर सकती थी . शबनम ने कागज के चिट पर छह शहरों के नाम लिखे और एक डब्बे में डाल दिए फिर अपनी बेटी से एक चिट निकालने के लिए बोला . जो चिट् निकली वो दिल्ली की थी इसको किस्मत का फैसला मान वो अपने परिवार के साथ दिल्ली चली आई .
दिल्ली आकार उन्होंने मीरा नायर की संस्था सलाम बालक के लिए काम करना शुरू कर दिया .यह संस्था दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उन बच्चो के लिए काम करती थी जो घर से भाग आये थे .यहा पर उनकी मुलाकात एक वरिष्ठ पत्रकार और छोटी फिल्म के निर्माता जुगनू रामास्वामी से हुई जिन्होंने उनके काम पर एक फिल्म बनाने की उनसे बात की .जुगनू ने ना केवल फिल्म बनायी उन्होंने शबनम के साथ शादी भी कर ली .फिल्म पुरी होने के बाद दिल्ली में ही शबनम ने सड़क के बच्चो के लिए एक स्कूल की स्थापना की जिसका नाम उन्होंने जागृति रखा .अधिकृत जगह पर ना होने की वजह से सरकार ने उनका यह स्कूल तोड़ दिया .इसके बाद वो पुराने कार्य क्षेत्र पश्चिमी बंगाल के कटना जिले में आ गयी यहाँ उन्होंने एक बार फिर जागृति नाम से एक मोडर्न एवं इंग्लिश माध्यम वाला स्कूल बनाने का फैसला किया जिसमे ग्रामीण बच्चे पढ़ सके और अपने को दूसरे साधन संपन्न बच्चो से अलग न समझे . साल २००५ में उन्होंने यह काम शुरू कर दिया. वो कटना वापिस तो आ गयी. पर उनको यहाँ बहुत विरोध भी झेलना पड़ा. क्योकि यह इलाका अच्छे इलाको में नहीं माना जाता था. लूट चोरी अपहरण आदि की घटनाये यहाँ बहुत होती थी. जब यहाँ के लोगो को पता चला कि शबनम स्कूल खोलना चाहती हैं और समाज कि भलाई के लिए कार्य करना चाहती हैं तो इनके यहाँ बहुत दुश्मन बन गए इन पर बम्ब से हमला किया गया ,जिसमे दोनों पति-पत्नी घायल भी हुए और इनके घर को काफी क्षति भी पहुची .पर इन्होने हार नहीं मानी.और अपने काम में लगी रही. स्कूल बन चुका था उसमे काम करने वाले लोगो की तलाश हो रही थी. इसके लिए उन्होंने वही रहने वाले उन असामाजिक तत्वों में से कुछ लोगो को काम पर रखा जो काम करना चाहते थे. और खुद को सुधारना चाहते थे .उनका घर भी उस तरह की औरतो के लिए आश्रय स्थल बन चुका था जिनके पति उन्हें मारते-पिटते थे .इस वजह से बहुत लोग उनके दुश्मन भी बनते जा रहे थे .इस दुश्मनी की वजह से ही उनके पति जुगनू की मौत भी हो गयी. पर पुलिस के अनुसार उन्हें बताया गया कि उनकी मौत दिल का दौरा पड़ने से हुयी हैं पर वो जानती थी कि जुगनू को उनके दुश्मनों ने जहर दिया है. वो टूट चुकी थी . जुगनू के शव को लेकर दिल्ली आई और उनका क्रियाकर्म किया वो अब दिल्ली में अपने बच्चो के साथ रह सकती थी पर सामाजिक कार्य करने की उनकी चाह की वजह से उन्होंने फिर से सारी शक्ति समेटी और वापिस कटना चली आई. और यहाँ फिर से अपना काम शुरू कर दिया.
शबनम के अनुसार- मैं हमेशा से बच्चों को पढ़ाने के लिए इस गांव में अंग्रेजी माध्यम के एक स्कूल का सपना देखती थी। मैं चाहती थी कि वे अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई करें ताकि वे अपने शहरी साथियों से पीछे न रहें। कभी अपराधियों, गरीबी और बेरोजगारी के लिए जाना जाने वाला मुर्शिदाबाद जिले का कटना गांव अब पूर्व अपराधियों को काम देने वाले स्कूल और एक कढ़ाई सहकारी समिति के लिए प्रसिद्ध है। रामास्वामी ही कढ़ाई सहकारी समिति भी चलाती हैं और इसमें 1,400 महिलाएं काम करती हैं।
कोलकाता के ला मार्टिनियर फॉर गर्ल्स की पूर्व छात्रा रामास्वामी कहती हैं कि इन इलाकों में बहुत से अपराधी हैं लेकिन वे जन्म से अपराधी नहीं थे। उन्होंने गरीबी के कारण अपराध को अपनाया था। जब उन्हें स्कूल में नौकरी मिली तो उन्होंने अपराध करना बंद कर दिया। उन्होंने बताया कि हमने जो लोग पहले अपराधी थे उन्हें मालियों, रसोइयों और वाहन चालकों की नौकरी दी लेकिन अब वे आपके और मेरे जैसे ही हैं।
शबनम रामास्वामी स्कूल चलाने के लिए धन इकट्ठा करने को इलाके की ही 1,400 से ज्यादा महिलाओं के साथ कटना कढ़ाई सहकारी केंद्र चलाती हैं। इससे होने वाली कमाई स्कूल के विकास कार्यों पर खर्च की जाती है। स्कूल गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा देता है। यहां के 460 से ज्यादा छात्रों में से 30 प्रतिशत छात्र इसी तरह के हैं।
जागृति पब्लिक स्कूल में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) का पाठ्यक्रम चलता है और यहां सातवीं तक की कक्षाएं लगती हैं। वर्ष 2005 में जब स्कूल की शुरुआत हुई थी, उस समय यहां केवल कक्षा दो तक की ही पढ़ाई होती थी। रामास्वामी ने बताया कि अगले साल स्कूल आठवीं कक्षा तक हो जाएगा। उन्होंने कहा कि मुझे १ साल में सीबीएसई से सम्बद्धता मिलने की उम्मीद थी पर २ साल हो गए उन्हें पंजीकृत नहीं किया गया इस कार्य के लिए भी सरकारी अफसर ने उनसे १,००,००० रूपये की रिश्वत मांगी और यह बात उन्होंने दिल्ली में अपने सम्मान समोराह में भाषण देते हुए कही साथ ही यह भी कहा कि अगर कोई इंसान यहाँ ऐसा है जो इन बच्चो के लिए हमारी मदद कर सकता है और उन लोगो से बात कर सकता है तो आगे आये.तब एक अफसर ने उस समोराह के बाद उनसे संपर्क किया और उनका यह कार्य करवाया. जज्बा उबका हमेशा काबिल-ए-तारीफ रहा और वो आज भी ऐसे बच्चो के लिए कार्य कर रही हैं.
Shabnam Ramaswamy,
Born in a village in the interiors of West Bengal's Murshidabad, Shabnam, got to study in Kolkata's elite La Martinere School, thanks to her father's Army job. At 16, she was married off to a wealthy 32-year-old who would beat her to a pulp. After bearing him two kids, her husband would regularly throw her out of the house at night because he felt their son didn't look like him. One night, at 24, she left home with her son.
For two months, she lived in a shanty at Sealdah station after which she got herself a job and worked her way out of poverty. Within a decade, she succeeded in her job as an interior decorator, got a divorce and won custody of her children. But she began to tire of high-society life and trained her sights on social work. "I decided to leave Kolkata, as it was awkward going from businesswoman to social worker in the very same city,'' she said. She wrote down the names of six cities on chits of paper and asked her daughter to pick a chit. The girl picked Delhi, so that's where the family went.
Shabnam joined Mira Nair's Salaam Balak, where she befriended run aways at Delhi station. A senior journalist, Jugnu Ramaswamy, approached her with the intention of making a film on her work. He not only made the film, but married her too. The Ramaswamys set up a school for street kids in Delhi, called Jagriti. After the school was demolished by the Delhi government, they headed to Katna in West Bengal, where they decided to set up a state-of-the-art school with the same name for rural kids. In 2005, just before the school began.
Shabnam can still remember the day - it was the 29th April 2006th Jugnu sat down at her feet, and began to massage her feet. "He always did when he wanted something from me." This time it was the school. The day before the construction of the building had been completed, and now it would be a question, fill them with life - hire teachers, receiving applications for school children, seek state permits. "I can build a school, I can not do it," said her husband "you have to do that."
Shabnam refused. She had enough to do their work. The pair were five years earlier, came from Delhi to Katna. Both had attended elite schools there, he was documentary filmmaker, she founded an NGO for street children, Street Survivors India '. But they knew that the great challenges of their lives outside the big city, lay in the poverty and backwardness of India's villages. They decided to move to Katna, Shabnam's home village in the northeastern tip of India, near the border with Bangladesh.
If they had thought they would be welcomed with open arms, they were mistaken. They brought unrest to the village, they disturbed the local power structure, dominated by the control by the Communist Party, the most important items - dominated - teachers, village council. The same was true for Shabnam family, a divided family, with close ties to the Communist Party and the mullah. The network of party, family, clergy made sure that state aid funds were diverted, that domestic violence was condoned, that the school because it was to pay salaries instead of giving lessons. When they wanted to establish its own school, came the first warning shot: a bomb exploded in front of her house, and Shabnam Jugnu were injured, destroyed her house half. They did not go to the police, and they are not buckled. When (highly indebted and with her uncle) a few weeks after the assassin, a landless peasant village of repentance before Shabnam threw on the floor, she placed him as a chauffeur. Her house became a refuge for women who were thrown from their husbands out of the house or left behind with the children. She went to the police, in court, fought welfare benefits led estranged couple back together, argued with the mullahs. Despite opposition from the Communist Party-appointed administrator of the district judge them to a kind of peace.
Now the school stood before the opening, but Shabnam wanted their women's group - not to give up - Stree Shakti ',' woman power '. Jugnu did not let up, and while massaging the feet and their resistance was always soft. Finally she agreed, "if you pay me this summer, a common holiday travel". Three days later, Jugnu was dead, the official cause of death was heart failure. But she knew what she had done this: Her husband had been poisoned. And they knew who had committed the crime - the brother of her mother, who had in turn violated the daughter when she was pulled into the village, and indeed was privy to. Lastly Jugnu had drawn the school logo - a dove in flight - with the Latin motto 'Fortitudine Vincimus'
Instead of depositing a murder complaint, Shabnam took the body back to Delhi in order to cremate there and the ashes to scatter according Jugnus desire in the winds. Everything had gone according to plan as far as the poisoner, and now they would turn their backs to the village and stay with the two children in Delhi. But Shabnam returned, took over the Jagriti School, as if nothing had happened as an unfortunate death in the family. It began with five classes, then eight, and by the next school year begins, the upper stage; Jagriti is now one of 340 students. Instead of competing with the public schools, Shabnam taught in neighboring villages, Study Centres' one, where students receive tutoring village. With their work, Stree Shakti 'forced them into one floor of the school building something like a refuge for women namedns, Dimini' - Caring - to set up.
They soon saw that this was not enough. Violate widowed, or on the run from violence needed that one chance, their livelihood and their children to deny. Shabnam hit upon the idea of the old local tradition of manufacturing to revive Kantha' new cloths. There is one, arte povera, "the superimposition of old discharged Saristoffen soft transparent muslin, which breaks down the worn places and shine through the beautiful patterns and colors. Are held together by two or three layers of geometric patterns or run the embroidery and cross stitch with colored thread. Kantha is one of these little wonders of India, which wraps the murky landscape of poverty in bright colors.
Shabnam Kanthas sold to her friends in Delhi and Calcutta, she grabbed it and drove it into bales of NGO bazaar in the big cities. Mothers of school children were aware of the work of the, also began to manufacture at home Kanthas. Shabnam had to buy fabrics and yarn by the hand, organize training courses, invited designers to Katna to show women the new pattern. Today there are approximately 1440 women from 65 villages, members of an NGO. They are members in more than one sense. For several months each of them co-owner of, Katna's Kantha Pvt.Ltd. '. The company also acts as a co-operative bank, in which the shareholders can get small loans, either to buy a sewing machine to host the wedding of the daughter, or money for drugs and doctor to have.
Received last November, Street Survivors India 'in Delhi a prize for their innovative activity. It was the first time that the broader public Shabnam Ramaswamy heard. In her speech, she was not satisfied with words of thanks: "I do not go on," she confessed before the shocked audience. "For two years I am waiting for the certification of the Jagriti School. I have had to pay 100,000 rupees in bribes in return for that otherwise the the school will close. If someone is sitting here in the auditorium, which has a hot line to Calcutta - then please, help! ". A senior government official came up to her afterward and offered to intervene. and then he really helped her to get that certification.
when someone asked her why she had not the murderer of her husband brought to justice. "What would it have availed?" She asked. "The village, my family, the murder accomplices had me for the rest of life met with hatred. I knew if I wanted to stay here, wanted to keep working, I had to forgive them. I found it less difficult than I had believed, perhaps because Jugnu would have done the same. "

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