Friday, August 5, 2011

LILAVATI.........................................लीलावती


LILAVATI (12TH CENTURY)

जहा आज भारतीय नारी समाज में अपनी जगह बनाने में लगी हैं और फिर से अपने को स्थापित करने में लगी हैं|वही प्राचीन काल में भारतीय नारी सभी विषयों में रूचि लेती थी | सिर्फ रूचि ही नहीं वो उन विषयों की सभाओ में तर्क-वितर्क करने के लिए भाग लेती थी | आज गणित जैसे विषय को लड़किया क्या लड़के भी कम पसंद करते है वही 12 वी शताब्दी में लीलावती नाम की महिला जानी-मानी गणितज्ञ थी |
ईस्वीं सन्‌ ग्यारह सौ चौदह में जन्मे भास्कराचार्य को संसार के एक महान गणितज्ञ के रूप में जाना जाता है।पर उनके गणित के ग्रन्थ लिखने में उनकी बेटी लीलावती का भी बहुत बड़ा हाथ रहा था | जब विवाह के एक वर्ष के अंदर ही लीलावती के पति की मृत्युख हो गयी और लीलावती अपने पिता के घर में ही रहने लगी | लीलावती को अपने पिताजी के ज्ञान पर और ज्योेतिष पर विश्वाखस हो गया क्योकि उनकी ज्योतिषी की गणना के हिसाब से ऐसा होना ही था । भास्कर से अपनी विधवा पुत्री की ग़मगीन हालत देखी नहीं जा रही थी इसलिए वो उसे किसी कार्य में व्यस्त रखना चाहते थे इसके लिए गणित उनके पास एक अच्छा विषय था जिसके वो प्रख्यात विद्वान थे और लीलावती को भी अपने पिता पर भरोसा होने लगा था इसलिए वह पिता के साथ ही गणित और ज्यो तिष के अध्य्यन में जुट गयी। भास्कराचार्य ने अपनी बेटी लीलावती को गणित सिखाने के लिए गणित के ऐसे सूत्र निकाले थे जो पद्य में होते थे। वे सूत्र कंठस्थ करना होते थे। उसके बाद उन सूत्रों का उपयोग करके गणित के प्रश्न हल करवाए जाते थे। कंठस्थ करने के पहले भास्कराचार्य लीलावती को सरल भाषा में, धीरे-धीरे समझा देते थे। वे बच्ची को प्यार से संबोधित करते चलते थे, "हिरन जैसे नयनों वाली प्यारी बिटिया लीलावती, ये जो सूत्र हैं...।" बेटी को पढ़ाने की इसी शैली का उपयोग करके भास्कराचार्य ने गणित का एक महान ग्रंथ लिखा, उस ग्रंथ का नाम ही उन्होंने "लीलावती" रख दिया। बेशक आजकल गणित एक शुष्क विषय माना जाता है। पर भास्कराचार्य का ग्रंथ ‘लीलावती‘ गणित को भी आनंद के साथ मनोरंजन, जिज्ञासा आदि का सम्मिश्रण करते हुए कैसे पढ़ाया जा सकता है, इसका नमूना है। लीलावती का एक उदाहरण देखें-

‘निर्मल कमलों के एक समूह के तृतीयांश, पंचमांश तथा षष्ठमांश से क्रमश: शिव, विष्णु और सूर्य की पूजा की, चतुर्थांश से पार्वती की और शेष छ: कमलों से गुरु चरणों की पूजा की गई। अये, बाले लीलावती, शीघ्र बता कि उस कमल समूह में कुल कितने फूल थे?‘ उत्तर-१२० कमल के फूल।

वर्ग और घन को समझाते हुए भास्कराचार्य कहते हैं ‘अये बाले, लीलावती, वर्गाकार क्षेत्र और उसका क्षेत्रफल वर्ग कहलाता है। दो समान संख्याओं का गुणन भी वर्ग कहलाता है। इसी प्रकार तीन समान संख्याओं का गुणनफल घन है और बारह कोष्ठों और समान भुजाओं वाला ठोस भी घन है।‘

‘मूल‘ शब्द संस्कृत में पेड़ या पौधे की जड़ के अर्थ में या व्यापक रूप में किसी वस्तु के कारण, उद्गम अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसलिए प्राचीन गणित में वर्ग मूल का अर्थ था ‘वर्ग का कारण या उद्गम अर्थात्‌ वर्ग एक भुजा‘। इसी प्रकार घनमूल का अर्थ भी समझा जा सकता है। वर्ग तथा घनमूल निकालने की अनेक विधियां प्रचलित थीं।
लीलावती के प्रश्नोंथ का जबाब देने के क्रम में ही "सिद्धान्त शिरोमणि" नामक एक विशाल ग्रन्थ लिखा गया , जिसके चार भाग हैं (१) लीलावती (२) बीजगणित (३) ग्रह गणिताध्याय और (४) गोलाध्याय। ‘लीलावती’ में बड़े ही सरल और काव्यात्मक तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है।
बादशाह अकबर के दरबार के विद्वान फैजी ने सन्‌ १५८७ में "लीलावती" का फारसी भाषा में अनुवाद किया। अंग्रेजी में "लीलावती" का पहला अनुवाद जे. वेलर ने सन्‌ १७१६ में किया। कुछ समय पहले तक भी भारत में कई शिक्षक गणित को दोहों में पढ़ाते थे। जैसे कि पन्द्रह का पहाड़ा ...तिया पैंतालीस, चौके साठ, छक्के नब्बे... अट्ठबीसा, नौ पैंतीसा...। इसी तरह कैलेंडर याद करवाने का तरीका भी पद्यमय सूत्र में था, "सि अप जूनो तीस के, बाकी के इकतीस, अट्ठाईस की फरवरी चौथे सन्‌ उनतीस!"
इस तरह गणित अपने पिता से सीखने के बाद लीलावती भी एक महान गणितज्ञ एवं खगोल शास्त्री के रूप में जानी गयी |
आज गणितज्ञो को गणित के प्रचार और प्रसार के क्षेत्र में लीलावती पुरूस्कार से सम्मानित किया जाता है |
पर आज जहा विदेशी लोग हमारे वेदिक गणित पर भरोसा करके उसे अपने बच्चो को सीखाते हैं वही हम अपनी संस्कृति के प्रति बिलकुल उदासीन हैं इसका एक उदहारण इस लिंक से पता चल जायेगा....

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A collection of poetry in the style of Lilavati by the Grade 8 students of the Canadian International School of Hong Kong

Lilavati
Lilavati was a mathematician and follower of her father Bhaskaracharya, the medieval mathematician, who codified Indian mathematics and described operations upon the zero, and whose work influenced later Arab mathematicians who took the science to Europe. The first part of his Siddhanta Shiromani, the ‘Patiganita’ dealing with arithmetic, is often called the ‘Lilavati’ after his daughter. In this, Bhaskara’s theories are presented in the form of a dialogue with his daughter, and it is clear from the text that she was an accomplished mathematician in her own right. Legend has it that she became a widow very young and Bhaskara, having tried to prevent her widowhood by astrological means, thereafter consoled her by teaching her his skills. Bhaskara’s theories were far ahead of corresponding European thought on the subject and were only surpassed in the eighteenth century in the West.
The name of Bhaskara’s theories comes from his daughter Līlāvatī. Many of the problems are addressed to Līlāvatī herself who must have been a very bright young woman.
The Lilavati, a text by the twelfth-century mathematician Bhaskara the Learned, was traditionally used for this purpose for arithmetic and this explains why it terminates with a verse with a double meaning in which Bhaskara compares his Lilavati, his gracious one" it also means arithmetic), to a woman endowed with all the graces of the jati (a word which means both of noble lineage and, in a technical sense, the reduction of fractions to a common denominator). "Joy and happiness in this world shall continually increase for those who hold her kanthasakta, close in their arms or clasped to their bosoms (learned by heart by repetition)."


In todays context :
Lilavati's Daughters: The Women Scientists of India,
is a collection of (auto)biographical essays of about 100 women scientists who have worked and are working in India. The name is drawn from The Lilavati, a twelfth century treatise in which the mathematician Bhaskaracharya addresses a number of problems to his daughter, Lilavati. Although legend has it that Lilavati never married again in her life and has no children from her first marriage , her intellectual legacy lives on in the form of her daughters - the women scientists of India.

1 comment:

  1. Puraatan samay se hi humare desh ko shiksha ke utthaan ke liye jaana jaata raha hai....iss desh me kitne hi mahaan purushon aur mahilaaon ne apne athak prayaason ki badaulat samaaj aur vishw ko vibhinn chhetron main ek nayi disha va roshni di hai....isi kadi main mahaan gadnitagya aadarniya LILAWATI JI ka naam bhi juda hua hai....
    Naresh ji aaj aapne iss mahaan vibhooti ka parichay karakar bada hi aadarsh kaarya kiya hai....iss post ko padne va samajhne main hi mujhe kaafi waqt lag gaya....iska iss tarah se prastutikaran karna apne aap main ek kaabiliyat hai....main hatprabh hoon....!! Naresh ji aap iss post ke liye badhaai ke paatr hain....aapka bahut bahut shukriya and thank you very much for sharing this..........

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